क्या घर मेरी सुरक्षित जगह है ?

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August 20, 2022

क्या आपने कभी किसी को ऐसा कहते सुना है की उनको घर पर रहना नहीं पसंद? घर पर रहना ना पसंद होने के कई मायने और कारण हो सकते हैं। स्कूल जाना ना पसंद होने के कई कारण हमको रोज ही दिख जाते हैं, परंतु यह समझना थोड़ा मुश्किल लगता है की किसी बच्चे को अपने घर पर रहना ही नहीं पसंद। मेरे लिए यह बात समझना उतना मुश्किल नहीं था क्योंकि मेरी कॉलेज की पढ़ाई के समय मुझे भी घर पर रहना नहीं भाता था और मैं  कोई भी लेक्चर नहीं छोड़ती थी। ऐसा नहीं था की मुझे रोज कॉलेज जाना बहुत पसंद था परंतु मुझे पता था की घर पर वो परिवेश ही नहीं है जहाँ मै शांति से अपना काम कर पाऊँ। जब राहुल (बदला हुआ नाम) ने मुझे कहा की उसको घर पर रहना नहीं पसंद तो मैं खुद को यह जानने से रोक नहीं पाई की उसे ऐसा क्यूँ लगता है। 

राहुल चौथी कक्षा में था परंतु वह अभी लिखना पढ़ना नहीं जानता था। वह कक्षा में बिल्कुल बात नहीं करता था और ना ही ज्यादा हँसता था। मुझे उसको बाकी बच्चों के साथ लेकर चलने में  थोड़ी दिक्कत हो रही थी। तब मैंने तय किया कि मैं प्रधान अध्यापक से बात करके उसे पहली-दूसरी के साथ बैठने को कहूँगी। और उन्होंने भी कोई आपत्ति नहीं जतायी। अब जब मैं पहली दूसरी कक्षा के साथ काम कर रही थी तो राहुल वहाँ था। वह उस दिन खुश लग रहा था, और कराए जाने वाले काम में उसका मन लग रहा था। आज वह सिर्फ मुस्कुराया ही नहीं बल्कि खूब खुलकर हँसा भी। मैंने उसे कभी इतनी खुशी से काम करते नहीं देखा था। अब मुझे लगा कि मेरा फैसला एक दम सही था। चौथी कक्षा के साथ वह कुछ भी नहीं सीख पाता था, और इसी कारण एक कोने में बैठा रहता था।अब वह काम कर पा रहा था और इसी लिए उसे मजा भी आ रहा था। उसे ऐसा नहीं लग रहा था कि उसे कुछ भी नहीं आता,  या फिर वह कुछ कर नहीं सकता। 

राहुल अब पहली दूसरी के साथ ही बैठने लगा था । परंतु पिछले हफ्ते से वह चौथी मे वापस आ गया है, बहुत कहने पर भी वापस नहीं जाना चाहता। मैंने भी उस बात पर ज्यादा जोर नहीं दिया। मैं  बस ये चाहती हूँ  की वह किसी भी कक्षा मे बैठे परंतु खुश रहे और कुछ सीखे। आज जब मैं  बच्चों को पुस्तकालय लेकर गई तो राहुल भी साथ था। मैंने सभी बच्चों को किताबें चुनने  को कहा। जो किताबें पढ़ पाते है वो किताबें पढ़ रहे थे और बाकी बच्चे अक्षर कार्ड की सहायता से शब्द ढूंढ रहे थे। जब सभी बच्चों को कुछ न कुछ काम मिल गया तो मैंने देखा की राहुल बस बाकी बच्चों के साथ शैतानी कर रहा है, और उसने अभी तक कोई किताब भी नहीं चुनी है। मैंने उसे आगे बुलाया और थोड़ी सख्त आवाज में कहा की तुम पहली कक्षा के साथ क्यूँ नहीं बैठते?  यहाँ भी कुछ काम नहीं कर रहे हो । वह थोड़ा सहम गया,ऐसा लग रहा था की वह बस अभी रो देगा। मैंने अपना स्वर नीचा किया और उससे  प्यार से पूछा –  तुम्हें वहाँ अच्छा नहीं लगता ? उसने सर हिलाकर ना कहा। मैंने उससे  फिर पूछा कि क्या तुम्हें यहीं चौथी कक्षा मे बैठना पसंद है? उसने फिर सर हिलाकर हाँ मे जवाब दिया। 

मैं – तुम्हें पढ़ना नहीं पसंद ?

राहुल- (कोई जवाब नहीं दिया।)

मैं – तुम्हें स्कूल आना पसंद है?

राहुल – हाँ 

मैं – तो कक्षा मे ध्यान क्यू नहीं देते?  स्कूल आते हो तो  कक्षा मे थोड़ा ध्यान दिया करो तभी तो कुछ सीखोगे। 

राहुल- हम्म 

मैं – तुम्हें घर पर रहना पसंद है?

राहुल – नहीं (कहकर रोने लगा) 

मैंने उसे अपने पास बिठा  लिया और प्यार से पकड़ा 

मैं – क्यूँ?

राहुल – (कोई जवाब नहीं)

मैं – क्या तुम्हें  है घर पर कोई मारता है?

राहुल – हाँ 

मैं  – कौन मम्मी? .. (हाँ मे सर हिलाता है).. पापा? (फिर एक बार हाँ मे सर हिलाता है)

मैं – इसीलिए तुम्हें स्कूल आना पसंद है। 

राहुल – हाँ 

राहुल रोए जा रहा था। ज्यादा सवाल करके मैं उसे दुखी नहीं करना चाहती थी। मैंने उसे कहा की ‘चलो कोई एक किताब ले आओ मै तुम्हें कहानी सुनाती हूँ’।  जो किताब वो लाया उसका नाम था, दीदी दीदी चीज़े ऊपर क्यूँ नहीं गिरती?  मैंने उससे पूछा कि चीज़े ऊपर क्यूँ नहीं गिरती और हवा मे पेन उछाल दिया। वह पेन ऊपर उछालने पर भी नीचे आकर गिरा और राहुल हँस पड़ा। उसने किताब ली और अपनी जगह पर जाकर उसमे चित्रों को देखने लगा। 

यह कक्षा मे हुआ एक छोटा सा किस्सा है , परंतु इसके आस पास बुनी बात बहुत बड़ी और गहरी है। बच्चों को कोई जगह अच्छी ना लगने के पीछे कुछ कारण ज़रूर होते हैं, क्या हम रुककर यह सवाल खुद से कभी करते हैं, कि बच्चों को अगर स्कूल नहीं पसंद तो क्यू नहीं पसंद?  छुट्टी की घंटी बजते ही वे बाहर क्यू भाग जाते है?  ऐसे ही कुछ बच्चों को अपना घर भी नहीं पसंद, जिसे हम आमतौर पर अपनी सुरक्षित जगह मानते है। एक बच्चे के लिए सुरक्षित जगह क्या होती है? उसे कहा रहना ज्यादा अच्छा लगता है? जब ये सारे सवाल हमारे जहन मे उठते हैं तो शायद हम सही दिशा मे जवाब खोजने निकल पड़ते हैं। परंतु अगर हम रुककर सोचते ही नहीं और खुद से सवाल नहीं करते तो ये समस्या बनी रहती है और बनी रहेगी। 

अब राहुल के लिए उसका घर एक सुरक्षित जगह नहीं, वहाँ वह खुश महसूस नहीं करता और  वहाँ से निकल आने के लिए स्कूल केवल एक विकल्प है। क्या ऐसे मे अध्यापक कुछ कर सकते  है? जरूर कर सकते है।शायद एक दिन मे इसका कोई हल ना निकले परंतु अपनी तरफ से कोशिश करने मे कोई हर्ज नहीं। आज मुझे फिर एक बार ये एहसास हुआ की कोई सीखना चाहता है या नहीं, यह तय करना भी कभी-कभी उसके हाथ मे नहीं होता। जब तक  राहुल सुरक्षित महसूस नहीं करेगा हमे उससे ये अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वह कक्षा मे ध्यान देगा। वह कुछ चीजों से वंचित है जो कि अनिवार्य हैं। मैं अपने स्तर पर फ़िलहाल  इतना तो जरूर कर सकती हूँ , कि राहुल और बाकी बच्चे मेरी कक्षा मे सुरक्षित महसूस करें। और उनकी खुशी किस चीज में  है यह मैं उनसे पूछकर तय कर पाऊँ। सीखने के लिहाज से राहुल का पहली मे बैठना ठीक है, परंतु वह उधर खुश होकर भी खुश नहीं है। अब इसके भी कई कारण हो सकते हैं, शायद बाकी बच्चे उसे चिड़ाते हैं या उसको अपनी कक्षा मे जाने को कहते  हैं, ऐसा अक्सर देखा गया है। जब तक  उन सभी बच्चों से बात नहीं हो जाती तब तक के लिए राहुल कहाँ बैठेगा यह उसे ही तय करने देते हैं… 

Written by : Shalu Sharma

About the Author

Shalu Sharma works as an Associate at Azim Premji Foundation. Apart from her work, she likes to read and watch movies that peek into the cruelty of the world

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